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मेरे अल्फाज़

ग़ज़ल

dinesh chand

14 कविताएं

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(1) तजुर्बात

ये तजुर्बात की बात है, कि संभल-संभल के चला करो।
जो गिर पड़े तो मलाल क्या फिर उठके आगे बढ़ा करो।

गर तहे दिल से तलाश है, तो रास्ते मिल जायेंगे ।
इस हवा के रुख़ पे निशान हैं, इन्हें गौर से पढ़ा करो।

बिगड़ी हुई हर बात को तुम सलवटों से पढ़ा करो।
ये नेकी-बदी का हिसाब है नसीब से न गिला करो।

कभी एक सा रहता नहीं, ये वक़्त का मिज़ाज है।
शबे-गमज़दा ढ़ल जायेगी, बस पाक दिल से दुआ करो।

तदबीर करना हक़ तेरा, तक़दीर पर कोई वश नहीं।
जब कोशिशें नाकाम हों, तो हौंसले से जिया करो।

(2) पंछियों के निशान

पंछियों के निशान मत ढूंढ़ो
छत्त पर आसमान मत ढूंढ़ो

मुक़द्दर, मेहनत का नतीजा है
यूं लकीरों में जहान मत ढूंढ़ो

दूर तक अज़नबी ये बस्ती है
यहां अपना मकान मत ढूंढ़ो

बेचकर वो ज़मीर बैठे हैं
यहां मुंह में ज़ुबान मत ढूंढ़ो

पार सहरा के फिर गुलिस्तां है,
राह में, सायबान मत ढूंढ़ो

फतह करना है अपनी बाहों से
जंग में, महरबान मत ढूंढ़ो

"दिनेशचंद शर्मा (चांद भरतपुरी)"


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