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मेरे अल्फाज़

सामने देखिए है खुला आसमाँ

dinesh chand

28 कविताएं

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सामने देखिए है खुला आसमाँ
खींच ली आपने सरहदें किसलिए
ये चमन कितना रंगीन है बुलबुलो
पाल ली ज़हन में रंजिशें किसलिए

जन्म आज़ाद है, मौत आज़ाद है
वक़्त भी हर हकूमत से आज़ाद है
ऊँच की नीच की, मज़हबी रीति की
बांधली पांव में, बेड़ियां किसलिये

बागवानों के तेवर चढ़े देखकर
गुलशनों से बहारें ख़फ़ा हो गयीं
फूल क़ाग़ज के, क़ाग़ज की हैं पत्तियां
पास आती नहीं तितलियां इसलिए

जिम्मेदारी से दामन छुड़ा चल दिये
चुन लिये आपने दूसरे रास्ते
जुर्म ये भी तो संगीन है दोस्तों
नींद आती नहीं रात भर इसलिए

तोड़ दो झूठे बंधन ख़ुदा के लिए
बन रहो तुम मिसालें सदा के लिए
सुबह हो जायेगी, रात खो जायेगी
आँख मूँदे हो यारों भला किसलिए

- दिनेशचंद शर्मा (चाँद भरतपुरी)

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