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मेरे अल्फाज़

इश्क़ में तेरे दर-बदर हुआ जाता हूँ

DILIP TRIPATHI

23 कविताएं

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इश्क़ में तेरे दर-बदर हुआ जाता हूँ ।
जैसे शाख कोई बेसमर हुआ जाता हूँ।।

और तुम कहते हो तो चलो ये भी सही।
मगर आँखों से तर-बतर हुआ जाता हूँ।।

दवाओं की तरह थी कभी तासीर मेरी ।
बिन तेरे देखो न जहर हुआ जाता हूँ ।।

मंजिल ने ही कहा है कि छोड़ दो हमको।
और ये दिल है, कि सफर हुआ जाता हूँ।।

अफसोस कि तुमने ही समझा नही हमको।
हैरत की जमाने में असर हुआ जाता हूँ ।।

मुसल्सल बहते है आँखों से आंसू मेरे ।
इंतजार हर घड़ी हर पहर हुआ जाता हूँ ।।

खुशनुमा शाम के मानिंद हम भी थे कभी।
तेरी यादों में जलके दोपहर हुआ जाता हूँ।।

मुकम्मल होना भी ख्वाब सा लगता है ।
साँसों की मर्जी है बसर हुआ जाता हूँ ।।

खयाल एहसास तजुर्बे क्या है सब ।
क्या कहूँ की कैसा बशर हुआ जाता हूँ ।।

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