आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   Ishk me tere dar-badar huàa jaata hun.

मेरे अल्फाज़

इश्क़ में तेरे दर-बदर हुआ जाता हूँ

DILIP TRIPATHI

14 कविताएं

208 Views
इश्क़ में तेरे दर-बदर हुआ जाता हूँ ।
जैसे शाख कोई बेसमर हुआ जाता हूँ।।

और तुम कहते हो तो चलो ये भी सही।
मगर आँखों से तर-बतर हुआ जाता हूँ।।

दवाओं की तरह थी कभी तासीर मेरी ।
बिन तेरे देखो न जहर हुआ जाता हूँ ।।

मंजिल ने ही कहा है कि छोड़ दो हमको।
और ये दिल है, कि सफर हुआ जाता हूँ।।

अफसोस कि तुमने ही समझा नही हमको।
हैरत की जमाने में असर हुआ जाता हूँ ।।

मुसल्सल बहते है आँखों से आंसू मेरे ।
इंतजार हर घड़ी हर पहर हुआ जाता हूँ ।।

खुशनुमा शाम के मानिंद हम भी थे कभी।
तेरी यादों में जलके दोपहर हुआ जाता हूँ।।

मुकम्मल होना भी ख्वाब सा लगता है ।
साँसों की मर्जी है बसर हुआ जाता हूँ ।।

खयाल एहसास तजुर्बे क्या है सब ।
क्या कहूँ की कैसा बशर हुआ जाता हूँ ।।

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
Comments
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!