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मेरे अल्फाज़

जिंदगी की उड़ान

diksha ratnesh

3 कविताएं

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जिंदगी की उड़ान
पंख फैलाये पंछी जब उड़ते हैं,
ना नभ को, ना धरा को देखते हैं
हवा के वेग और खुद पर विश्वास
को लिए अनंत आकाश में,
कुछ पा जाने की चाह में
वो उड़ते फिरते हैं |

एक जगह रुक जाना, प्रकृति का नियम नहीं
नदियों की धाराएं भी
अविरल चलते हुए सागर में मिलती हैं
पत्थरों से टकराते, उफनते हुए
अपना रास्ता तय कर, मंजिल को पाती हैं

तो तुम क्यों रुके हो ?
क्या मेहनत से तुम डरते हो ?
या फिर संदेह में रहते हो ?
सभी रास्ते खुल जायेगे, गर एक बार ठान लिया

चलो, बढ़ो और उससे भी ज्यादा उड़ो..
क्योकि, जिंदगी की उड़ान अभी बाकी है |
बनानी है जो पहचान अभी बाकी है ||

-दीक्षा रत्नेश
प्रोफेसर, पत्रकारिता एवं जन संचार


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