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dhundhta hun bas khuda

मेरे अल्फाज़

ढूंढता हूँ बस ख़ुदा

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इश्क़ में ही तो किसी पे मरा जाता है
बिना मरे इश्क़ कैसे करा जाता है

बिना परों के भी उड़ रहे है हम
बे वजह परिंदा उड़ने से डरा जाता है !

वो रहता सदा अदब-ए-हिज़ाब में
क्या जाने की कैसे संवरा जाता है

बागबाँ परेशां है अपने गुल के लिए
गुलशन में कहाँ से ये भंवरा जाता है

मुहब्बत में..... मैं ढूंढता हूँ बस ख़ुदा
मुझमे ना भगवा जाता है ना हरा जाता है

~आला चौहान"मुसाफ़िर"

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