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मेरे अल्फाज़

कुछ न कहो !

dheeraj srivastava

7 कविताएं

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कुछ न कहो !

चुप रहो
कुछ न कहो
कह दिया है तुमने
जो कहना था तुम्हें
घुल गए हैं
तुम्हारे अल्फाज़़
इन हवाओं में
इन फ़िजाओं में
इन महकते गुलों में
तुम चुप रहो
सुनने दो मुझे।

कँपकँपाते लबों को
अब रहने दो
सुन लिया है मैंने
जो तुम्हें कहना था
शाम ढल रही है
चलो, चलें
अपने कदमों के निशान
छोड़ते हुए...कहीं दूर।

मिलकर भी न मिल सके
तो ग़म न करना
क्योंकि हम जी चुके हैं
उन हंसी लम्हों को
जिन्हें जीने की आरजू में
सदियाँ गुज़र जाती हैं।

तुम चुप रहना
मैं भी चुप रहूँगा
न तुम कुछ कहना
न मैं कुछ कहूँगा
तुम मुझको सुनना
मैं तुमको सुनूँगा
तनहा-तनहा
भीगी रातों में
बरसती शामों में
लहरों के करीब
सुनसान राहों में
सर्द में गुजरते हुए।

चुप रहो, कुछ न कहो
कह दिया है तुमने
जो कहना था तुम्हें।



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