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मेरे अल्फाज़

ग़ज़ल

dheeraj nigam

16 कविताएं

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खेल-ए-इश्क़ अच्छा है पर खेल पुराना है
कैदी सब अब के नए है पर जेल पुराना है

दिन दो दिन का होता तो फिर भी छूट जाता
मियां पुरखों पुरानी सियासत है ये मैल पुराना है

चिड़िया तो खुद चाहती थी तेरी भूख मिटाना
किस्मत देख शिकारी कि तेरा गुलेल पुराना है

वो मैं जो घर की पुरानी ईंट तक नहीं तोड़ता
फिर घड़ी तोड़ दी ये सोच के कि बस सैल पुराना है

टूटे घर की खातिर ही बेच आया हुनर अपना
वरना मेरे हुनर के आगे तो ये नोबेल पुराना है 


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