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मेरे अल्फाज़

तेरे दिल से यूँ भी उतर जाना....

dheeraj nigam

16 कविताएं

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तेरे दिल से यूँ भी उतर जाना अच्छा लगा
कि तेरे बगैर भी तेरा दीवाना अच्छा लगा

तेरे जाते ही तेरी सहेली का रिश्ता आया मुझे
था तो मैं अनाड़ी,पर मेरा निशाना अच्छा लगा

ताजमहल तो मैं भी बनवा सकता था मगर
मिट्टी का बदन मिट्टी मैं ही मिलाना अच्छा लगा

अब तमाशा क्यों बना जो जाता हूं मयकदे की ज़ानिब
वो आशिक़ ही क्या, जिसको न मयखाना अच्छा लगा

दीवारें पुरानी ,खिड़कियां पुरानी, छत भी पुरानी थी
जैसा भी था मुझको मेरा घर पुराना अच्छा लगा

- धीरज प्रकाश

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