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मेरे अल्फाज़

शख्स कोई जिन्दा नज़र नहीं आता

Dharvender Singh

139 कविताएं

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पेड़ तो बहुत हैंं मगर कोई परिन्दा नज़र नहीं आता
अब इस सहरा में कोई बाशिन्दा नज़र नहीं आता

यूँ तो मजमा लगा है यहाँ हर तरफ इन्सानों का लेकिन
मुर्दों की इस भीड़ में शख्स कोई जिन्दा नज़र नहीं आता

अस्मतें रोज लुटती हैं हुकूमत पर उंगलियाँ रोज उठती हैं
मगर लानत है हुकमरान कोई शर्मिन्दा नज़र नहीं आता

'नामचीन'इक मायूसी सी छाई है यहाँ हर किसी के चेहरे पर
इन बुझते हुए चराग़ों में चराग़ कोई ताबिन्दा नज़र नहीं आता

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