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मेरे अल्फाज़

सारी हेकड़ी निकाल दी

Dharvender Singh

140 कविताएं

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तकदीरों के होठों ने मेहनतों के सामने ठोंक जब ताल दी
तो मेहनतों की चोटों ने तकदीरों की सारी हेकड़ी निकाल दी

तूफ़ान कब किसी पर मेहरबान हुआ करते हैं वो तो
इत्तेफाक से लहरों ने मेरी कश्ती साहिल पर उछाल दी

मुझपे इक ऐसा सानेहा गुजरने वाला था कि मैं मरने वाला था
लेकिन किसी की दुआओं ने मेरे सर से वो मुसीबत टाल दी

जीने को क्या नहीं किया करते हैं फिर भी लोग उतना जिया करते हैं
उम्र मुकद्दरों मे उस खुदा ने है जिसको जितने साल दी

'नामचीन' हम सिर्फ उतनी पीया करते हैं जितनी
साकिया ने अपने होंठों से चूमकर पैमाने में डाल दी

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