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मेरे अल्फाज़

नफरतों के दरिया अब खतरे के निशां तक पहुँच गए

Dharvender Singh

74 कविताएं

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परिन्दे उड़कर आसमां तक पहुँच गए
साइंसदा इस जहां से उस जहां तक पहुँच गए

सच बोलने वाले आज भी वहीं के वहीं हैं मगर
झूठ बोलने वाले तरक्की करके सियासतदां तक पहुँच गए

अब तक मेरे सीने में दफन थे जो जज्बात तेरी खातिर
वो अल्फ़ाज़ बनकर आज मेरी जुबां तक पहुँच गए

अब अगर एक बूंद भी और गिरी तो उफनने लगेंगे
नफरतों के दरिया अब खतरे के निशां तक पहुँच गए

'नामचीन' मुमकिन है किसी दिन मेरी गर्दन भी पकड़ लें
जालिम के वो हाथ जो आज मेरे गिरेबां तक पहुँच गए

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