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मेरे अल्फाज़

हुकूमत को शायर पंसद नहीं होते

Dharvender Singh

14 कविताएं

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ख़ुशामद करने वाले लोग बस चन्द नहीं होते
जितने हम हैं सब इतने ग़ैरतमन्द नहीं होते

दुनिया तो तैयार है हमें पलकों पर बिठाने को मगर
इस मेहमाननवाज़ी को हम ही रजामन्द नहीं होते

ये अना का ख़जाना जाकर ग़रीबों में बांट दो
अमीर इस दौलत के जरूरतमन्द नहीं होते

कोशिश करने वाले सिर्फ़ एक नाकामी से
कामयाबी के तमाम रास्ते बन्द नहीं होते

हाथ में कासा हो साथ में थोड़ा सा असासा हो
फ़कीर और किसी चीज़ के ख़्वाहिशमन्द नहीं होते

हमें कैसे नवाज़ सकती थी किसी खिताब से
'नामचीन' हुकूमत को शायर पसन्द नहीं होते


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