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मेरे अल्फाज़

गम सदा मेरा हमसफ़र रहा

Dharvender Singh

35 कविताएं

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कितना दुश्वार मेरी हयात का सफ़र रहा
खुशी कभी मिली नहीं गम सदा मेरा हमसफ़र रहा

जिन्दगी की राहों में कोई रहबर मिला न रहनुमा
मैं खुद ही अपना रहनुमा खुद ही अपना रहबर रहा

रोशनी थी पास में फिर भी उजालों की तलाश में
मैं इस गली से उस गली भटकता दरबदर रहा

सारी दुनियाँ वाकिफ़ थी मेरी मौत की खबर से मगर
बाखबर होकर भी वो बेवफा बेखबर रहा

इक दिन थोड़ी सी पी ली थी उनकी आंखों के मयखाने से
'नामचीन'नशा उस शराब का फिर हम पर उम्र भर रहा

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