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मेरे अल्फाज़

कविता.... सूखा दरख़्त

Dharamveer Verma

68 कविताएं

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दूर लगे उस पेड़ पर
किसी की नज़र अब नहीं जाती है
न कोई महक
न कोई मोर बैठता है उस पर
न कोयलिया ही
मीठा गीत गाती है
कभी उसकी पत्तियां
फूल और फलों का गुच्छा
उसका प्रतीक थीं
कुछ ज्यादा तो नहीं
पर कर्कश धूप को
निगलने का यन्त्र एक सटीक थी
तब
कोयलिया भी मीठा गाती थी
और
उसके तले ढेरों इंसानों की
भीड़ नजर आती थी
समय बदला
वक्त भी ढला
कुदरत ने उसके यौवन
रंग रुप को छला
पेड तो पेड
उसकी पत्तियों का रंग भी बदल गया
अब छांव देने की हिम्मत न रही
फल दे सके दुनियां को
ऐसी ताकत भी न रही
पंछी तो पंछी
इंसानों उससे बेरुखी कर ली
अब वह पेड नहीं
सूखा दरख्त ही कहलाता है
छावं फल नहीं
उसके दामन में
तभी तो तले कोई मनुष्य नहीं आता है
यही कारण है कि
मनुष्य जीवों में सबसे स्वार्थी कहलाता है ।
||| आज जो पराया है
वो ही कल अपना था
उसी के नक्शे कदम पर
ही तो हमको चलना था
सभी को देनी थी
छावं की सुखन
फल व फूलों का गुच्छा
फल लगे हो लाखों
पर नीचे ही झुकना था।

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