कविता.. बदनाम करते रहे

                
                                                             
                            लोग शीशों को बेवजह
                                                                     
                            
यूं ही बदनाम करते रहे
अपने रहे थे हमेशा मोम से बनकर
और दिल में घाव करते रहे ।

शीशे तो बेजुबान हैं
वो कहां किसी से कुछ कहते हैं
तोडता है जब कोई मारकर पत्थर
तभी तो वो पांव में चुभते हैं
लोग खामख्वाह शीशों पर इल्जाम रखते रहे
सदा कटी जिन्दगी
हमारी फूलों के हमपरस्त
फूल ही थे जो चुपचाप घाव करते रहे ।
लोग शीशों को बेवजह बदनाम करते रहे ।

लहरों ने भंवर में फसांया था
ये झूठ कहां
मिटाने का यत्न निभाया था
ये झूठ कहां
लहरों ने चोट दी दर पे दर
चोट लगी पर दिल की लगी न बन सकी
उनका इक इक वार
हम सह गये पत्थर बनकर
हम तो लहरों में रहे
भंवर में फंसकर
लहरों से बच गये और खुदा की बन्दगी करते रहे
साहिल का क्या बिगाडा था हमनें
वो क्यों चुपचाप हमको डसते रहे
लोग शीशों को बेवजह बदनाम करते रहे ।

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2 years ago

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