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मेरे अल्फाज़

सेवा निवृति

Dhananjay Singh

47 कविताएं

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कफ़स से निकला परिंदा भरता उड़ान है
रिटायर होकर हुआ आज़ाद इंसान है।

हुआ रातों रात सेहत में क्या बदलाव है
कि अगले दिन हैं रिटायर, किस्सा अनजान है।

समय मिल पाया नहीं कुछ इच्छाओं के लिए
अधूरा रखना न कोई भी अब अरमान है।

कभी भी एल. टी. सी. नौकरी में लिया नहीं
मज़ा क्या जब नौकरी में टूर किया नहीं।

थके हैं कर काम, अब फ़रमाना आराम है
बदन को करना घिसाकर क्यों परेशान है।

बहुत ज्यादा काम कर क्यों होना बीमार है
सहारा है अब बहुत पेंशन का, क्या शान है।

बचे थोडे साल हैं, दिन लगते लंबे बड़े
दिवस छोटे साल थे लंबे जब जवान हैं।

ख़ुशी है घर में समय अब दे सकेंगे बहुत
नई पीढ़ी का ज़रा अब रखना कुछ ध्यान है।

रुपेला होती बिदाई उत्सव के रूप में
सदा उत्सव-सी ख़ुशी का अब रखना मान है।

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