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मेरे अल्फाज़

भूल कविता

Devender Singh

1 कविता

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भूल

कभी कभी यह उठती है
ह्रदय में एक कम्पन सी
जैसे बोलने में अतिरिक्त हुआ कोई शब्द
या कि छूट गया कोई सामान सफ़र में
जो फिर देती है टीस अनायास ही,
फिर लुढ़क जाती दिन के अस्त होने के साथ
और हम स्वयं को करते सुस्थिर

भूल
कभी जो पैदा की गई
साथ स्वत्व के
साथ कभी अन्यत्व के
जो लगती अब बेस्वाद - मलाल सी
संघर्षण से, सबक से ही फिर शमित होती यह ज्वाल
और हम स्वयं को करते स्थिर

पर, कभी यह
उभरती एक ताजा जख्म सी कल आज और फिर कल
सड़ती रहती अछोर, अंत:स्थली में,
चिरकालिन बने रहने के वादे के साथ
और रह रह कर झकझोरती,
हराती- अलंघ्य होकर
- एक कलंक सी

बचो
बचो ऐसी भूलों से
ऐसे हरे निष्टुर जख्मों से जो
न भरेंगे कभी
और यदि भरें तो भरेंगें तुम्हें लील लेने पर
या कि फिर विलीन होंगे समय के धुंधलके में
इतिहासविदों को धोखा देकर

देवेंद्र
वरिष्ठ हिंदी अनुवादक
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड 


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