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मेरे अल्फाज़

निर्भया फिर

Devender Grover

16 कविताएं

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दुनिया चलती रही, ऋतुएं बदलती रहीं,
पर एक निर्भया रोज कुचलती रही,
चंद साँस खुल कर लेने के लिए,
इज्जत उसकी रोज उछलती रही।

कयोंकि

निरंतर अत्याचार हुआ,
इस देश में अबला नारी का,
कैसा ये बुरा हाल हुआ,
इस देश में अबला नारी का।

जगह जगह दरिंदे घूम रहे,
नारी की अस्मत लूट रहे,
हर जगह नज़र गड़ाए बैठे हैं,
न जाने ये सांठ कहाँ से आये हैं।

मन तब छिन्न भिन्न हो जाता है,
जब तंज ये मुझ पर कसते हैं,
तन पूरा ही छिल जाता है,
जब वस्र ये मेरा हरते हैं।

निर्भया तुम्हें अभी और जीना होगा,
बार बार वस्त्र हरण के लिए,
क्योंकि देश अभी मेरा सोया है,
तुझ पर सियासत करने के लिए।

निर्भया के इस वस्त्र हरण की,
आवाज़ ये मिलकर हमें उठानी होगी,
दोषी को दंडित करने के लिए,
उसके दोनों अंगूठों और लिंग बलि की,
आवाज़ संसद में उठानी होगी,
प्रजातंत्र के ठेकेदारों का भी,
घमंड जमीन पर लाना होगा,
सोया ज़मीर जो सालों से,
उसको हर हाल जगाना होगा,
निर्भया तुम्हें हर हाल में,
इन्साफ हमें दिलवाना होगा।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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