मैं अहंकार

                
                                                             
                            मैं अहंकार, आँखों पर चढ़ा एक सुनहरा चश्मा हूँ मैं,
                                                                     
                            
मैं अहंकार, राह से भटका देता हूँ मैं 
संस्कारों को,
मैं अहंकार, चमक ही कुछ ऐसी है मेरी कि चारों तरफ रोशनी ही रोशनी नज़र आती है,
मैं अहंकार, आँखों को अपनी चमक से चौंधिया देता हूँ,
मैं अहंकार, एक नीर का बुलबुला हूँ मैं, मस्तिष्क में तेरे,
मैं अहंकार, एक मिथ्या से भरा चक्रव्यूह हूँ मैं,
मैं अहंकार, पुण्य कर्मों को भी हीन कर देना ही काम है मेरा,
मैं अहंकार, ऑंखें बंद करके भी सबकुछ चकाचौंध दिखाई देता है मेरी रोशनी में,
मैं अहंकार, सर्व गुण हूँ मैं रिश्तों को बिगाड़ देने में,
मैं अहंकार, खुद को सर्वश्रेष्ठ समझना ही धर्म है मेरा,
मैं अहंकार, दूसरों को झुका कर खुश रहने में मुझे मजा आता है,
मैं अहंकार, तुमको राह से भटका देना ही मेरा काम है,
मैं अहंकार, तेरे प्रतिबिम्ब बन जाने तक ज़िंदा हूँ मैं,
मैं अहंकार, तत्वहीन हूँ, कुछ नहीं, बस भ्रम का एक संसार हूँ मैं,
मैं अहंकार, तुझे शून्य कर देने तक ज़िंदा हूँ,
मैं अहंकार, मतिभ्रम करनें मे माहिर हूँ मैं,
मैं अहंकार, यह अहंकार तेरा तेरे मिट जाने तक ज़िंदा है।
त्याग इस भ्रम को, छोड़ अहंकार, संस्कारों को अपना।

-हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
1 year ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
X