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मेरे अल्फाज़

आरक्षण एक दानव

Devender Grover

16 कविताएं

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आरक्षण की हथकड़यों से जकड़ा मैं।
कब टूटेंगी ये हथकड़ियां
कब मिलेगी आज़ादी मुझे इस बन्धन से।
मैं पूछता हूँ इस देश के हुक्मुरानों से।
बांध के देखो ये बन्धन, अपने हाथों में इक बार।
नहीं रह पाओगे 1 दिन भी तुम।
फिर मुझे क्यों बांधा है 70 सालों से।
क्यो नहीं देते मुझे भी आजादी इस बन्धन से।
झुलस रहा हूं मैं (भारत) आरक्षण की आग में।
और सुलग रही हैं मेरी शाखायें (सम्पत्ति) इस दानव के समराज्य में।
कौन है गुनहगार इन सुलगते शैलों का।
उज्वल है भविष्य मेरा भारत के शिक्षित हाथों में,
जिन्हें बिठा कर रखा है
इन विदेशियों ने अपने सिर आंखों पर, तुम बिठा कर रखते हो आरक्षण की तलवार पर।
क्या मर गयी इंसानियत बस वोटों के नाम पर
सींचना था जिन शिक्षित युवाओं ने,
मेरी इस देश की माटी को ओर
बनाया इस काबिल कि योगदान दे
मुझे मेरा सर उंचा करने का।
पर छोड़ जाता है वो मुझे, तोड़ इन हथकड़ियों को
सींचने विदेश की माटी को, सड़ कर आरक्षण की आग में।
छोड़ मुझे वहीं जकड़ा लाचार और लचर हाथों में।
दो आरक्षण सिर्फ शिक्षा में तुम, आमदनी के आधार पर।
पर न दो आरक्षण तुम किसी को जाति के आधार पर,
न शिक्षा में, न रोजगार में, न तरक्की ओर उन्नती में किसी भी आधार पर।

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