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mother poem

मेरे अल्फाज़

माँ पर कविता

Deepak Singh

1 कविता

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सड़क के हर एक मोड़ पर वही तस्वीर मिल जाती है मुझे!
किसी बूढ़ी औरत को देख कर, माँ बहुत याद आती है मुझे!!

इन गलियों के हाथों की कठपुतली हो गया है माँ तेरा बेटा,
की तेरी तलाश में 'यहाँ से वहाँ-वहाँ से यहाँ' नचाती हैं मुझे!!

माँ आहटें भी लुक्का-छिपी सा खेल खेलती है.. इन दिनों,
हर नयी आहट थप्पा सी है और तू छुप कर सताती है मुझे!!

बे-शक मुक़द्दर में नही था मेरे...तेरे हाथों का बना खाना,
लेकिन दीदी के रूप में यक़ीनन तू खाना खिलाती है मुझे!!

किसी बच्चे को अपनी माँ की ऊँगली थामे जो देखता हूँ,
फिर तेरी याद...तेरे न होने का एहसास क्यूँ कराती है मुझे!!

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