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मेरे अल्फाज़

है सुख़नवर

Deepak Singh

4 कविताएं

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गीत-ग़ज़लों छन्द-कविता की हरारत है सुख़नवर
घटते-बढ़ते ताप के जैसी शरारत है सुख़नवर!

ध्यान से प्यारों बुज़ुर्गों की तरह तुम सुन लो हमको
आपकी शिक्षा तरक़्क़ी की जरूरत है सुख़नवर

शहरों-शहरों घूमना मक़सद नहीं है बस हमारा
बद'हवाओं से मियां करते हिफ़ाज़त है सुख़नवर

दो तवज्जो सिर्फ़ हमकों आप बस ये सोच कर की
सूर-तुलसी मीर-ग़ालिब की विरासत है सुख़नवर

हों बुराई का अंधेरा लाख़ इस बज़्मे-सुख़न में
जुगनुओं की पर चमक जैसी सदाक़त है सुख़नवर

-दीपक सिंग
सुख़नवर:- रचनाकार
सदाक़त:- सच्चाई
बज़्मे-सुख़न:- बर्तालाप की सभा, काव्य सभा

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