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मेरे अल्फाज़

अहम

Deepak Narang

229 कविताएं

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अहम बड़ा विध्वंसकारी
हारे रावण लंका सारी
अहम करे बुद्धि को अन्धा
चौपट हो जीवन का धन्धा
ये अलगपन का भाव भी है
इसमें प्रेम का अभाव भी है
अहम सबसे करता दूर
बढ़ता जाए व्यर्थ गरूर
कभी अहं पहुचाए लाभ बड़ा
कोई अहं चोट से शीर्ष चढ़ा
कृष्ण ने बीच रणभूमि
अर्जुन का अहम जगाया
विचलित मन को संभाल
तभी वो युद्ध लड़ पाया
चाहे योगी और हो साधक
कहे अहम को पथ बाधक
ना इसके प्रवाह में बह जाना
केवल द्रष्टा बन के रह जाना

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