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मेरे अल्फाज़

प्यार करना एक गुनाह

Deepak Narang

63 कविताएं

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वो तुमारी गली से गुजरते मेरा बार बार रुक जाना।

वो घर की खिड़की से तुम्हारी नजरों का झुक जाना।

वो मन मन्दिर में तुम्हारी मूरत बनाना।

तारीफ के कोमल अल्फाजो से खूबसूरत बनाना।

तुम्हारे दीदार को शुभ महूर्त बनाना।

अपने जीवन की सांसो से बढ़कर जरूरत बनाना।

वो मेरा खत लिखना और लिख लिख कर मिटाना।

वो मेरा शहर से निकल तुम्हारे गांव आना।

वो धूप में तुम्हारा, छत पर नंगे पाव आना।

फूल के शूल से उस पर घाव आना।

वो हमारा मिलना और जुदा हो जाना।

जैसे प्यार करना इक गुनाह हो जाना।

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