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हम सब एक हैं

                
                                                                                 
                            जिसने ये जहां बनाया
                                                                                                

उसके लिए सब एक है
धर्म के नाम पर
फिर क्यूं मतभेद है

वो व्रत करें या रोज़ा करें
दुआ और अरदास सबकी एक है
इसकी जटाएं और उसकी टोपी
खुदा तो सबका एक है

हाथ में थाली, माथे पर तिलक
दिया जलाकर तू आरती कर
मैं 4 बजे अज़ान करुं
उस अल्ला की नमाज़ करुं
सुनने वाला तो वो एक ही है
फिर क्यू ये मतभेद है

रेत बजरी से मंदिर बना
रेत बजरी से मस्जिद बनी
तूने लाल रंगा
मैंने हरा रंगा
फिर इस खुदा को हमने बांट दिया।

तुझे मुझे और सब को
बनाया उस खुदा ने है
फिर किसने कहां
हिन्दु राम में
और अल्ला में रहीम है

हमारा हलवा और तुम्हारी सेवईया
दोनों शक्कर से बनें,
मिठास दोनों में है,
फिर धर्मों में क्यूं बटें

जल, पानी और वायु
सब एक है
राम और रहीम भी एक है
फिर क्यों यहां धर्मों का खेल है


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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2 years ago

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