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मेरे अल्फाज़

मुक्तक: कृष्ण-राम

Deepa Gupta

249 कविताएं

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छंद-मत्तगयंद सवैया
शि०वि०-सात भगण+गुरु गुरु
211 211 211 211 211 211 211 22

(मुक्तक )

कृष्ण

सावन गेर रहे नयना अब लाल जसोमति  दुलार रही हैं।
मोहिनि  मूरत  श्यामल  सूरत  मोहन को  पुचकार रही हैं।
तीनहुँ लोक बसें जिसके घट  देख रहीं उस श्याम सलोने-
कोटि-सवाल चलें मन भीतर कोइ विधान विचार रही हैं।।

**     ***    ***    ***    ***    **

राम

राम सिया वन में भटकें,अरु भोर भई पितु रोय रहे हैं।
कंचन कांति हुई  निस्तेज, लहू पग यौवन खोय रहे हैं।
जो लख रूप अनूप सिया, मन भीतर कोस रहे उस माँ को-
कारण जो इस दीन दशा, उस को सब शूल चुभोय रहे हैं।।

दीपा संजय"*दीप*

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