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Jade ki dhup

मेरे अल्फाज़

जाड़े की धूप

Deepa Gupta

34 कविताएं

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नई नवेली दुल्हन जैसी
शर्माती जाड़े की धूप
मन करता है पकड़ूं उसको
कर लूं अपने घर में बंद
जब जी चाहे तब ही सेकूँ
सुखद सुनहरी प्यारी धूप
चुपके से खिड़की से गायब हो जाती जाड़े की धूप
नई नवेली दुल्हन जैसी
शर्माती जाड़े की धूप
माँ कहती है रखती, तन को
स्वस्थ, भगाये हर दुर्गन्ध
छ्त के ऊपर जाकर देखूं
न्यारी वह जाड़े की धूप
बादल के पीछे चन्दा सी
छुप जाती जाड़े की धूप
नई नवेली दुल्हन जैसी
शर्माती जाड़े की धूप
कहती दादी माँ बच्चों को
घर जिनके होते हैं तंग
रोग उन्ही के घर मे लाऊँ
क्योंकि उन्हें मिले न धूप
सुन्दर मन मस्तिष्क बनाये
हल्की सुकुमारी सी धूप
नई नवेली दुल्हन जैसी
शर्माती जाड़े की धूप

- दीपा संजय

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