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 bachpan ki lalsa

मेरे अल्फाज़

बचपन की लालसा

Chandan Kumar

45 कविताएं

42 Views
ये जिन्दगी है !
बचपन में पापा
पढ़ने के लिए
घर से बाहर कर दिये !
जब आते थे मिलने
बहुत रोता था मैं !

दिल कहता था
मुझे भी घर ले चलो
यहाँ मन नहीं लगता है
अनजान जगह है
कोई अपना नहीं लगता है
घर में अपने सड़क पर
और बगीचे में खेलूँगा
दादा का किस्सा सुनूँगा
दादी की चाय पियूँगा
बहनों के साथ
मम्मी की गोद में
मेला जाऊँगा ------
यूँ ही दिल कहते जाता
और मै जोर-जोर से रोते रह जाता !
मगर पापा फीस भर कर
मुझे छोड़कर, घर चले जाते
अपने खेतों में लग जाते !
आज देखो****
मैं पढ़ लिख कर
सरकारी नौकरी कर रहा हूँ ।
माँ-बाप,पत्नी,बच्चे को छोड़ कर
जब नौकरी पर जाता हूँ
मेरी तरह आज मेरे बच्चे
जोर-जोर से रोते रह जाते हैं
ये सोचकर कि
इतना प्यारा गोद
न जाने फिर कब मिलेगा !!!

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