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मेरे अल्फाज़

रुक गयी जो बात थी

Bvijay Joshi

36 कविताएं

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रूक गयी वो जो बात थी
फिर वही मौसम फिर वही फर्क
क्यों हो जाती है उम्र
तू बोल तो बचपन चंचल फिर क्यों
नहीं आता
सब बेबाक बडबोले है
इत्र परोसे बिन शुकुन भी कमतर आता
वो जो डाकिया था
पत्तों पे रब का तार लिखता था
अब क्यों वो भी नहीं आता
रूक गयी वो जो बात थी
फिर वही मौसम फिर वही फर्क
क्यों हो जाती है उम्र
तू बोल तो बचपन चंचल फिर क्यों
नहीं आता
तुने भी सरद की धुंध जलायी है
अंगेठी में
पाथर की वो चाख
मुस्कराने लगी है
रूक गयी वो जो बात थी
फिर वही मौसम फिर वही फर्क
क्यों हो जाती है उम्र
तू बोल तो बचपन चंचल फिर क्यों
नहीं आता

- बिजय जोशी,(पिथौरागढ़)

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