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मेरे अल्फाज़

जिसे माटी समझते हैं

Brijesh Kumar

5 कविताएं

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जिसे माटी समझते हैं वही सोना निकलता है
यहाँ जिसका है कद जितना वही बौना निकलता है
ये गैरों की ही फितरत है कभी अच्छा नहीं करते
बुरा भी चाहने वाला कोई अपना निकलता है
ये दौर-ए-आजमाइश है कहो कैसे निभे दुनिया
हमें भी देखना है किसमें दम कितना निकलता है
ये दिल की गुस्ताखी है या निगाहों का भरम शायद
जिसे हकीकत समझते हैं वही सपना निकलता है

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