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मेरे अल्फाज़

बेटियां

Bodhisatva Kastooriya

9 कविताएं

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क्यूं आज भी समाज़ में घुट-घुट के जी रही हैं बेटियां
पांवों में पायल नहीं, बेड़ी पहन कर जी रही हैं बेटियां
धिक्कार है समाज को जहां, बैश्या बन जी रही है बेटियां,
हमने कभी उन्हें देवी कहा, दासी बन जी रही हैं बेटियां
समाज़ के रक्षक भक्षक बने फ़िर भी जी रही हैं बेटियां,
भाई-बाप ही आनर किलिंग करे, कहां जी रही हैं बेटियां?
अभिषाप रुकेगा नहीं,क्योंकि होठों को सी रही हैं बेटियां,
घर बाहर बोलने की दो इज़ाज़त,अबला न रही है बेटियां
समाज के जिस अभिषाप का,पुरुष उत्तरदायी रहा हमेशा,
परिवार के सम्मान को क्यूं गले लगा जी रही है बेटियां

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