ख़्वाब आत्महत्या और सुशांत सिंह राजपूत

                
                                                             
                            ख़्वाब जब अधिकार से आगे निकल जाए
                                                                     
                            
ज़िंदगी का फ़लसफ़ा जब हाथ ना आए
तब आँख में घनघोर सा निराश होता है
निराश में फ़िर ज़िंदगी का प्रतिकार होता है

आदमी फ़िर सूली या विषपान करता है
पर ज़िंदगी का ख़्वाब तनिक ना कम करता है
चाहता हैं उड़ना आकाश के हर छोर पर
पैरों के नीचें ज़मीन का ना ध्यान करता है

जब टूटता साहस सहारा तब निराश होता है
आदमी तब जान देने का प्रयास करता है
ख़्वाब देखें उतना, जितना अधिकार उसका हो
तो ज़िंदगी में इंसान वहीं बस राज करता है ।।

बिमल तिवारी "आत्मबोध"
देवरिया उत्तर प्रदेश

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1 year ago

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