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मेरे अल्फाज़

वो नाराज़ सा नहीं लगता है

Birender Singhal

60 कविताएं

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उसके मन मे कोई बात रह गई लगता है
नाराज़ होकर भी वो नाराज़ सा नही लगता है

उसे बर्दाश्त नही होता ज़ुल्म कैसा भी
वो पागल कभी दीवाना सा लगता है

कुछ इस तरह मुफलिसी छाई है यहां
हाल पूछते हैं वो तो एक ताना सा लगता है

उम्र अपनी भी लंबी ही गुजरेगी सनम
दर्द में एक पल एक जमाना सा लगता है

तू इश्क में है उसके समझ लेना ए दिल
जिसके आने से पतझड़ सुहाना सा लगता है

दूसरों के चहरे पर ला कर मुस्काने
सब खो कर भी सब पाना सा लगता है

- बीरेंद्र सिंघल

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