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मेरे अल्फाज़

राह चलती रही

Birender Singhal

57 कविताएं

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फांसलें बढ़ते रहे जिंदगी घटती रही
कदम रुक गए मगर राह चलती रही

याद पास बैठ कर रोने कभी हंसने लगी
रात बुझ गई मगर ये शमां जलती रही

अश्क़ आंख से गिरे गिर के यूं बिखर गए
टूटता रहा गगन जमीं पिघलती रही

वो पुकारता रहा बंद किवाड़ों से यूं
बेचैन निगाहे रहीं रूह मचलती रही

तोड़ कर शीशा ए दिल गम कई गुना हुआ
अश्क़ उफनते रहे आह निकलती रही

- बीरेंद्र सिंघल

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