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Dohe

मेरे अल्फाज़

जीवन के दोहे

Bindeshwar Prasad

29 कविताएं

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घटता-बढ़ता चाँद है, बहुत अजब है खेल
साथ सूर्य अरु चाँद का, होता कभी न मेल।
नदियाँ कल-कल वह रही, झरने गाते गीत
घूंघट ओढ़े ताल भी, ढूंढ रहा मन मीत।
राम लखन माँ जानकी, जय जय जय हनुमान
यही मंत्र भगवान का, कर देता उत्थान।
धन दौलत जाता नहीं, खाली रहता हाथ
फिर भी इनकी लालसा, रहे सभी के साथ।
कूप सूख सारे गये, फूट गयी तकदीर
दर्शन दुर्लभ हो गये, निर्मल मीठा नीर।

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