भारत आजकल

                
                                                             
                            ढूंढता हूँ हर पल उम्मीद की किरण कहीं दिख जाये-2
                                                                     
                            

हर तरफ निराशा हर तरफ द्वेष
भाई भाई से अलग कैसा हो गया है देश
झकझोर देती मुझे, है घनघोरता का प्रवेश

समाज में क्यों है द्वंद्व,क्यों है गलत की तरफ झुकाव?
क्या हम आज फिर से होने जा रहे है "ग़ुलाम" ?

क्या अपना पक्ष रखना गुनाह हो गया है ?
लेकिन भई मैं देशद्रोही नहीं हूँ

क्या हमे बाँध के पानी पीने के लिए
मज़बूर तो नहीं किया जा रहा ?

हमें आज़ादी क्या सिर्फ छह दशक के लिए ही मिली थी ?

जिस्म की ग़ुलामी से बड़ी है मानसिकता की ग़ुलामी
जिस पर लगाई जा रही है दौलत बेनामी

कुछ भी कहो ताकत रखती है दौलत
सच को देना पड़ता है प्रमाण हर वक़्त

आज भी झूठ आसानी से बिक जाता है
और सच का प्रायोजक दुनिया से ही मिट जाता है

पढ़ने लिखने का ज़माना है चला गया
और जाते जाते पढ़ने लिखने वालों के हाथ
पकोड़ा है थमा गया |

क्यों है एक अजीब सा डर कि मेरा जन्म
किसी तानाशाह देश में
तो नहीं हो गया
खुल के ना बोलने की वजह से
हंसना कहीं खो गया |

आज़ादी से रहना इतना नाख़ुशगवारा था किसी को
जो सात दशक बाद फिर से ग़ुलामी
इंसानो की भरे बाज़ार हो गयी नीलामी |

घोड़े की तरह भागती हुयी अर्थव्यवस्था
औंधे मुँह आ गिरी और मर गयी
सम्प्रदायकता की व्यवस्था फिर से जीवित हो गयी

स्पॉटलाइट में आने की खातिर,
किसी भी हद तक जाते
बड़े बड़े हैं देख लिए

आम इंसान की बात करने वाले
जेल जाते हैं देख लिए

क्या हिंदुस्तान का और इम्तेहान बाकी है
क्या निचले इंसान को सुई के
नक्के से निकलना अभी बाकी है ?

वैज्ञानिक था एक जो दुष्ट के साथ विदा हुआ
प्रचार प्रसार है हकूमत,
यह बताकर है विदा हुआ

संभलना चाहते हो तो
संभल जाओ
ऐ हिंदुस्तान वालो

नहीं तो दास्तानें
कभी जगह नहीं देतीं
खुद में समाने को .....|

बिक्रम चत्तोवाल....
09873587510



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8 months ago
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