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मेरे अल्फाज़

माँ

Bikash Anand

4 कविताएं

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माँ तुम्हारे असीम गुणों का मैं क्या करूं गुणगान रे,
अपने कलम के दो अक्षर माँ करता तेरे नाम रे!

अबोध बालक के मुख बसने वाली जननी तू महान् रे,
माँ तुम्हारी असीम गुणों का मै क्या करू गुणगान रे

जब मैं छोटा सा था माँ,
तुझे रातो को निन्द ना आती थी,
सोकर स्वयं गीले मे,
मुझे सुखे मे सुलाती थी,

रोता था मैं जब रातो को,
तू मुझे लोरिया सुनाती थी,
स्वर्ग जैसे आँचल की छाव मे,
तू मुझे सुलाती थीं,

तुम्हारे gyaan के सामने फ़िका पड़ता हैं विज्ञान रे,
माँ तुम्हारी असीम गुणों का मै क्या करू गुणगान रे 
भूखे पेट रहकर भी तू मुझको खिलाती हो,
खुद रो रोकर भी अपने बेटे को खुश कराती हो,
अरे पुत -कपुत सुना पर माता सुनी ना कुमाता रे,
ईश्वर भी तेरी महिमा के गाते हैं गाथा रे,

अद्भुत, निराली ओर ममतामयी तु हर बच्चे की हैं जान रे,
माँ तुम्हारी असीम गुणों का मै क्या करू गुणगान रे 

जब कोई अपनी माँ को खो देता है तो देखिये कैसा लगता होगा उनको

मृत्युपरान्त के बाद के भाव

जी करता कभी -कभी सुनने को तेरी उस वाणी को ,
धरती पर कोन सुने दुख भरे बेटे की कहानी को,
कलेजा फ़ट जाता माँ उठते ही तेरी छाया रे,
आसु भी अब सुख पड़े पर तुझसे ना मिल पाया रे,

कोन सा देश तू चली गयी माँ क्यों ना लोट आती रे,
एक खत लिखकर माँ कारण तो जरा बतलाती रे,

दुनिया मे सब मिलते पर कभी ना मिलती माता रे,
माँ तो आखिर माँ होती है दूजा ना कोई भाता रे,
माँ मुझे आशिर्वाद देना मैं बनू एकदिन महान् रे,
कितना भी बड़ा बनूगा पर जुबा पर सदा होगा तेरा नाम रे,
माँ तू महान् रे, माँ तू महान् रे....... love u माँ

- बिकाश आनंद
राधानगर, बाँका, बिहार

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