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मेरे अल्फाज़

क्या आसूं भी कभी रोता है

Bikash Anand

4 कविताएं

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याद आ रही हैं वो बीती बातें,
हसकर जो काटी थीं रातें,

आंखों में तब जलन सा होता है,
क्या आसूं भी कभी रोता है

उड़ रही थी उपवन में कलिया,
तुझे देखने के लिए घूमता था तेरी गलिया,

वो दीवाना लड़का नाजाने क्या क्या सपने सजोता है
क्या आंसू भी कभी रोता है

निकलती थी जब वो सज संवरकर
लड़के को देख मुस्कुराती थी

लड़के के मनोदशा को देख
मुझे भी हसी आती थी

लड़का उसकी राहो में फ़ूलो को क्यों सजोता हैं
क्या आसु भी कभी रोता है

अचानक सड़क पार करते समय
लड़की की दुर्घटना हो जाती हैं

कुछ बोलना चाहती थी वो
मगर ना बोल पाती है

आज तक उठ ना वो लड़का जो उसके वियोग में सोता है
क्या आसु भी कभी रोता है

भला कैसे सहता वो
अपनी प्राण प्यारी का गम

तड़प तड़प के निकल रहे थे
उनदोनो के दम

जनाब! जब कोई अपनी जान को खोता है
तो आंखों से बहता आसु भी कभी रोता है 

दर्द ने दर्द से पूछा कि क्या तुझे दर्द के वक्त दर्द होता हैं
तभी दर्द ने हसकर कहा, भला मोत से बड़ा भी कोई दर्द होता हैं
तब आंखों से बहता आसु भी कभी रोता है .....

- बिकाश आनंद
राधानगर, बाँका, बिहार

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