आपका शहर Close
Kavya Kavya
Hindi News ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   Bijuka

मेरे अल्फाज़

बिजूका

संजॉय बैनी

4 कविताएं

1 Views
विडम्बना है
स्व वैचारिक द्वंद की
परिणति जब उन्माद,
हिंसा से होते हुए तोप,
बम, गन पे आकर केंद्रित हो,
जब हिंसा को
विद्रोह बता
क्रांति का नाम दे दो
मासूम निरीह आखों में
कुटिलता भर दो
थमा दो मुठ्ठी भर बारूद की खाद
फैलाने के लिए उस जगह
जहाँ गिरी हों पसीने की बूंदे
जहाँ उगी हो लाल केसर और
कपास के कोये ..

बोकर रक्त-बीज
"हाशियों" की मेढ़ बना
"हाशिये" रोप लाल मिट्टी में
भोथी हसिए से फिर काटी
"हाशियों" की फसल
जो रसातल के ट्यूबवेल से
आक्रोश सिंचित है

रात को दरवाज़े पे मेरे
आकर गुर्राते हो
अपने पैने नुकीले दांत दिखा कर
मुझे डराते हो
मैं नही डरता तुम्हारे मिमियाने, घिघियाने से,
मैं बिजूका हूँ गड़ा हुआ बीच में,
बंटा हुआ बीच से,
तुम्हारे लालच से चमकती आँखें
तुम्हारे जीभ से टपकती रेबीज़ की धार
वो जो तुम्हारे मुँह में जो ख़ून लगा है
वो उन तुम्हारे पालतू जोंकों का है
जो चूसते थे ख़ून उन निरीह दोपायों का,
जो भूख-प्यास की पीड़ा से बेहाल
आ घुसे थे तुम्हारे "हाशिए" मे...।

तुम रोते हो रात रात भर उस बरगद के नीचे
घात लगाए, घोंसलों से परिंदों के चूजों पर
अपने हाशिये पर बैठ,
उनके पंख नोच, नरम गोश्त वाले शिकार के इंतज़ार में
तुम्हारे रोने में इंसान नहीं होता
कुत्तों सा अपशकुन होता है....

रक्तिम आभा में,
रक्तपात का धर्म निभाओ
रक्तरंजित हाथों से
रक्तचरित रचो,
तार तार कर
हो जाओ निर्वस्त्र
अंतः व वाह्य,
देह का या संवेदनाओ का,
बलात्कार तो तुम्हारा हक़ है
रौंदी हुई हरी घास,
टूटी चारपाई और कुचली चादर
गवाह है तुम्हारे पुरुषत्व के
उन खेतों के ऊपर मंडराते है
गिध्दों के झुंड,
रातों को चीखतीं झगड़ती है चीलों की टोली
नोचती खसोटती ज़िंदा मुर्दों की आँखें,
सूंघ सूंघ के चाटते बोतल में बची
व्हिस्की की बूंदें, वो रक्त पिपासु लकड़बघ्घे,
घुसाते है अपनी नुकीली थूंथ, उन जांघो के बीच जहाँ संस्कृति सभ्यता में बदलती है,
जहाँ मायने, परिभाषाएं, विचार बहती हुई,
टांगों के बीच से बंजर भूमि को सींचती है।

तुम्हारा ही भगीरथ प्रयास और प्रताप है,
जो बंजर, बीमारू बांझ कोख़ भी
लाल कर रोप दी अपने विषाक्त
विचारों के शुक्राणु से, जो शनैः शनैः
उगल रही है क्लैव्य, क्लान्त व
कलुषित विष बेल सी असाध्य पीढ़ी, जो अपने चूषकों से सोखते ख़ून हमारी पल्मोनरी से।

आडम्बर है तुम्हारा साम्य और सर्वहारा
ढकोसला है तुम्हारे सिद्धान्त और बुर्जुआ
छलावा, दिखावा है तुम्हारी
बन्द मुठ्ठी वाला "हम",
हंसिया हथौड़ी का आंदोलन,
किसी पिस्सू से चिपके, स्वम् फूलते जाते हो
चिपके चमड़ी से किसी सर्वहारा की
अभिशप्त हो, श्रापित हो, हाशिये के बिल में
छुपे रहते हो, बार बार केंचुली बदलते हो।

किसी बजबजाती नाले सा
बदबूदार है तुम्हारा अस्तित्व
लिसलिसे विचारों का संकमण हो,
तुम अहिरावण से, एड्स के विषाणु
एक बूंद से हज़ारो फैल जाते है समाज में।
तुम इम्मयून हो चुके हो,अमर हो चुके हो, इच्छित हो चुके हो, तुम "स्वमभू"
तुम "श्रेणीहीन" हो,
क्योंकि
तुम तो बस
तथाकथित
"बुद्धिजीवी" हो...

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
सर्वाधिक पढ़े गए
Top

Other Properties:

Disclaimer

अपनी वेबसाइट पर हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर अनुभव प्रदान कर सकें, वेबसाइट के ट्रैफिक का विश्लेषण कर सकें, कॉन्टेंट व्यक्तिगत तरीके से पेश कर सकें और हमारे पार्टनर्स, जैसे की Google, और सोशल मीडिया साइट्स, जैसे की Facebook, के साथ लक्षित विज्ञापन पेश करने के लिए उपयोग कर सकें। साथ ही, अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।

Agree
Your Story has been saved!