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मेरे अल्फाज़

श्रमाश्रित से हुये मशीनाश्रित

Bijay Bahadur

413 कविताएं

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बचे समय, हो स्वयं हित
श्रमाश्रित से हुये मशीनाश्रित
शारीरिक श्रम हुआ सिफर
मेहनत से लगने लगा डर

हो गए सभी अपने में कैद
हर दिन बुलाने पड़ते बैद्य
ऐसी बदली जीवन शैली
जीवन रेखा हुई मटमैली

ढेंकी, जातां, ओखल, मूसल
सामूहिकता को देते थे बल
परस्परता के थे कारण
घरेलू कार्य के उपकरण

विलासिता बन गई आंदोलन
प्रकृति का हो रहा अंधदोहन
सुविधाएं खुद में बनी तनाव
स्वास्थ्य का हुआ पराभव

हृदय रोग और रक्त चाप
जा रहा बढ़, इनका संताप
हर दूसरा लिए, स्थूल देह
हर तीसरे को घेरा, मधुमेह

बदल गया जीवन आयाम
खर्च दे होता व्यायाम
शांति का करने आभास
जाना पड़ता प्रकृति पास

पहले के घर के उपकरण
स्वस्थ रहने के थे कारण
हर कार्य मे था सम्मिलित
श्रम,सामूहिकता और संगीत

- विजय बहादुर तिवारी

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