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मेरे अल्फाज़

क्या भूलूं क्या याद करूं...

Bijay Bahadur

413 कविताएं

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अपनाया जिंदगी में उस धर्म को,
अपनों द्वारा दिये जा रहे मर्म को
पुराने घर के टूटते बलरेज को
पुरातन हुये इन कुर्सी व मेज को ॥

इस ढलते हुए एज को
घट-बढ़ रहे इमेज को
दर्दों भरी निज सेज को
सच्चाई के घटते हुये क्रेज को ॥

मन में चलते पुराने चित्र को
बचपन के बिछुड़े पुराने मित्र को
उपार्जित किए घाटा और नफा को
जिसे समझ न सका उसकी वफा को ॥

किस काल को किस खण्ड को
पर-कर्म से मिलते दण्ड को
अपने दृढ़ प्रतिज्ञ व्यवहार को
जरूरत से ज्यादा कटु आचार को ॥

- विजय धूल

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