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मेरे अल्फाज़

खुद गाते ठहाके लगाते गये

Bijay Bahadur

232 कविताएं

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मुझे मालूम था वो मेरी मंजिल न थी
उनकी राहों मे कदम हम बढ़ाते गये।
न राहें रुकी न रहबर मिला
लहूलुहान पगों संग लड़खड़ाते गये।।

आशिक़ी के अंधेरे छाए थे ऐसे
सूरज को चाँद बुलाते रहे ।
तप्त किरणों को समझते रहें चाँदनी
हम सूरज को दीपक दिखाते रहे ॥

मय्यसर नही थे हाइकु के शब्द
हम कबिता, कहानी बनाते गये।
वादियों को समझ,गजलों की महफिल
खुद गाते, ठहाके लगाते गये ॥

बिजय बहादुर तिवारी, बोकारो
सर्वाधिकार सुरक्षित

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