आपका शहर Close
Hindi News ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   Kalam ki kasak

मेरे अल्फाज़

कलम की कसक

Bijay Bahadur

235 कविताएं

28 Views
कविवर मुझको करो स्वतंत्र
टिप्पणी  करना फिर अन्यत्र
भर जहर दिलाते मुझसे दंश
हो बगुला, बनकर रहते हंस
करते भावनाओं के व्यापार
दे नाम गरीबी, भूख, प्यार
होकर के कलम सिपाही
पाने हेतु झूठी वाहवाही
कलम को ही कर लिए कैद
मैं जानती तेरी हर भेद
चाहती लिखूं यथार्थवाद
आ जाता तुमको स्वार्थ याद
  नहीं रह पाती मैं राहत में
लाइक्स, ताली की चाहत में
बनाते हो मष्तिष्क परतंत्र
कहे जाते  लेखक   स्वतंत्र
अतिक्रमण से पृथ्वी भरती आह
प्रकृति   प्रदूषण से  कराह रही
बढ़ मनुष्य अन्य प्राणी लुप्त
भ्रष्टाचारी बढे ईमानदारी गुप्त
बरसाना चाहती मैं अंगार
तुमको दिखता प्यार श्रंगार
चांदनी, फूल से होकर घायल
राजनीतिक ठिठोरी के तुम कायल
बनवाते मुझसे शब्द समूू ह
हूँ लिखती पर रोती रूह
स्वप्रचार है  केवल ध्येय
उद्योग विज्ञान को भी दो श्रेय
पारिश्रमिक पाने के चक्कर में
सोच और शब्दों के टक्कर में
सिपाही के बस हुई कलम
मेरे श्रम को आ रही शर्म

बिजय बहादुर तिवारी, बोकारो
सर्वाधिकार सुरक्षित

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें

 
सर्वाधिक पढ़े गए
Top

Other Properties:

Disclaimer

अपनी वेबसाइट पर हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर अनुभव प्रदान कर सकें, वेबसाइट के ट्रैफिक का विश्लेषण कर सकें, कॉन्टेंट व्यक्तिगत तरीके से पेश कर सकें और हमारे पार्टनर्स, जैसे की Google, और सोशल मीडिया साइट्स, जैसे की Facebook, के साथ लक्षित विज्ञापन पेश करने के लिए उपयोग कर सकें। साथ ही, अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।

Agree
Your Story has been saved!