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मेरे अल्फाज़

जीवन का मूलार्थ नहीं

Bijay Bahadur

328 कविताएं

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किसी होड़ में किसी मोड़ पे
डिगने लगे जब  अंतस का बल
हो निराश  उद्देश्य त्यागना
जीवन  का  मूलार्थ नहीं  ।।

आशा, संबंध  व सुविधाएं
जीने की  ललक  बढ़ाएँ
आजमाइश में इन्हें त्यागना
पागलपन है नि:स्वार्थ नहीं।।

आगत का एकमात्र अर्थ है
जो बीता, हो चुका व्यर्थ है
प्रकृति, प्रतीक्षा, प्रिय वचन
भूल जाना  सत्यार्थ  नहीं।

अनुसंधान, और  खोजों में
मानना  हार चंद रोजों में
लगनशीलता  को त्यागना
मेहनत का परमार्थ नहीं।।

मंजिल की नहीं डगर भाए
जब राहें नहीं नजर आये
वैकल्पिक मार्ग चुने बिना
बैठ जाना  पुरुषार्थ  नहीं।

बिजय बहादुर तिवारी
बोकारो इस्पात नगर


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