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मेरे अल्फाज़

गणतन्त्र और आजादी

Bijay Bahadur

455 कविताएं

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जनवरी छब्बीस सन पचास
भारत ने था रचा इतिहास
बना प्रजातांत्रिक एक गणतन्त्र
महती लिखित संवैधानिक तंत्र

जनता बनी सरकार निर्माता
भारतीय नागरिक गर्वी मतदाता
भागीदारी,न्याय समान अधिकार
पदासीन होते बिना वर्ग विचार

कई क्षेत्रों में बढ़ी चमक
कृषि,अन्तरिक्ष है रहा दमक
दलितों ने ली है अंगड़ाई
पिछड़ों ने है प्रगति पाई

दूसरा पहलू देख आता नीर
कोई भूखा कोई बहुत अमीर
जनसंख्या वृद्धि सबका कारण
तुष्टिकरण का बढ़ता रावण

पदबल धनबल जातिबल
भ्रष्टाचार का बढ़ता दलदल
झूठों को मिलता मलमल
सत्य निरीह रहा हाथे मल

वर्षो हुए स्वतन्त्रता मिले
चले आ रहे यही सिलसिले
गोरखधंधे भ्रष्टाचार वही है
बेरोजगारी,नारी-अनाचार वही है

एक ही देश में, दो दो बचपन
पोषित और अपहृत’लड़कपन
दोनों के कंधे पे, थैले बड़े हैं
किसी में पुस्तक,कही कचड़े भरे हैं


- बिजय बहादुर तिवारी,बोकारो

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