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मेरे अल्फाज़

दूर तभी तुमसे तम होगा...

Bhupendra Parmar

1 कविता

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अंधकार है कहते रहना, ऐसे न अंधकार कम होगा,
बिना कहे कुछ दीप जलाना, दूर तभी तुमसे तम होगा
यदि रोशनी पाना है तो, खुद जुगनू सा जलना होगा,
मोती तुमको मिल जाएंगे, गहरे घाट उतरना होगा,
जीवनरूपी राह में राही, कभी खुशी कभी ग़म होगा।।

कोई नहीं है दूर दूर तक, आप अकेले चलना होगा,
यहाँ ना माँ की लोरी होगी,यहाँ ना कोई पलना होगा,
मिल जाएगी शीतल छाया , पहले धूप में जलना होगा,
कभी खुशी के दीप जलेंगे, कभी यहाँ पे मातम होगा।।

जीवन रूपी इस सागर में, नाव भी तुम पतवार भी तुम,
कर्मभूमि के इस रण में, ढाल भी तुम ,हथियार भी तुम,
विषम वेदना के मंजर में, नफरत तुम हो ,प्यार भी तुम
महासमय के महासमर में, दृढ़ भी तुम, लाचार भी तुम
तू अभिमन्यु,तेरे सम्मुख, चक्रव्यूह तो हरदम होगा।।

जब भी काली रातें होंगी, तू एक अकेला तारा होगा,
लेकिन दिन के उजियारे में , साथ जमाना सारा होगा,
संग मनाएंगे सब खुशियां, गमगीत अकेले गाना होगा,
काँटों पर चलकर ही तुझको, फूल की वादी जाना होगा,
जीवन में कभी राग सुधा सा, कभी दर्द का सरगम होगा
बिना कहे कुछ दीप जलाना, दूर तभी तुमसे तम होगा।।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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