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मेरे अल्फाज़

मिट्टी का आईना

Bhupendra Kumar

5 कविताएं

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बचपन तुझे देखा है मैंने मिट्टी के आईने में,
हँसते भी थे,रोते भी थे,ना कुछ छिपा था सीने में।।
ना ख्वाहिशें महँगी रहीं,
ना शौक थे अमीरों के।
तन धूल में सना रहा,
मन फक्कड़ी फकीरों से ।
ना ठेस दिल को लगती
ना उलझनें जमीरों से।
छोटी सी जिद जो पूरी हो,कितना मजा था जीने में।।
बचपन तुझे देखा है मैंने.....।।।
अब ख्वाहिशों का चक्कर,
दिन रात मैं लगाता हूँ।
चाहत मेंं अमीरी की,
रातों तलक जगा हूँ।
उड़ता हूँ परिंदों सा,
ना धूल से नाता है।
छोटी सी बात दिल में,
जमीर हिलता है।
मन ढूढ़ता आराम व्यर्थ,मेहनती पसीने में ।।
बचपन तुझे देखा है...।।।
निश्छल सी थी मुस्कान वो,
नदियों के बहते नीर सा।
ना द्वेश दिल में था कभी,
सबके लिए मैं पीर था ।
कांधे पे घूमता था,
पापा का मैं तो हीर था।
नफरत न थी मेरे प्रति, बसता था सबके सीने में।।
बचपन तुझे देखा है...।।।
हँसने लगा हूँ जोर से,
अब चीखती आवाज है।
कड़वाहटें है दिल में,
लाखोंं दफन अब राज हैं।
फुर्सत नहीं मेले की,
अब जिंदगी नासाज है।
नफरत भरी निगाहें, क्या खाक मजा जीने में।
बचपन तुझे देखा है..।।।

रचनाकार
भूपेंद्र कुमार सिंह
प्रयागराज ।


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