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मेरे अल्फाज़

तभी तो हँसकर झूला था

Bhoopnarayan

5 कविताएं

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भले ,लोग भूल जाएं रिश्ते,
पर वो दिन कभी न भूलेंगे,
जब- जब सितंबर आयेगा,
बस इंकलाब ही बोलेंगे।

अट्ठाईस सितंबर दिन था वो,
जब कौर ने एक वीर उठाया था,
था भले लाल वह किसन सिंह का,
भारत माँ का निग़हबां आया था।

था रोष बचपन से उसमें,
बस देर थीं बाहर आने की,
लाला की मृत्यु पर उसने,
सान्डर्स को मारने की ठानी थी।

भले "भगत सिंह" नाम था उसका,
पर दर्द बहुत सा सहना था,
भारत माँ की जफर की खातिर,
कफ़न शीश पर पहना था।

बस देर थी इंकलाब के उठने की,
पर लोग पेचीदे देखे थे।
लोगों को तारीक से बाहर लाने,
संसद में बम औऱ पर्चे फेंके थे।

भारत माँ का लाल था सच्चा,
तभी तो हंसकर झूला था,
जाते- जाते वक़्त भी उसने
"माय रंग दे बसंती" बोला था।

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