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Pain of Old Age

मेरे अल्फाज़

जिस गली से मैं हर रोज़ गुज़रता हूं

bheem agrahari

25 कविताएं

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जिस गली से मैं हर रोज गुजरता हूं
उसी गली में एक बूढ़ा फकीर रहता है

फकीरी दौलत से नहीं उसको रिश्तों से है
आलीशान कोठी, नौकर-चाकर सबकुछ है

फिर भी बात करने को कोई साथी नहीं है
साथी के लिये काफिर बन घूमता गली-गली

मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारे में सुबह शाम फरियाद करे
पर वह दौलत मिली नहीं जिसका वो तलाश करे

दौलत जुटाने में रिश्तों की तुरपाई करना भूल गया
समय के साथ बीबी-बच्चे और बहू भी रिश्ता तोड़ गई

जिस पर लुटाई थी जवानी बुढ़ापे में वो हाथ छोड़ गए
जितने अपने थे सब धीरे-धीरे अलविदा कहते चले गए

रिश्ते नहीं तो बुढ़ापे में कोई दौलत काम नहीं आती है
रिश्तों के बिना सारी दौलत मिट्टी में मिल जाती है।

रिश्तों को संजोए रखेंगे तो बुढ़ापे में भी रवानी रहेगी
रिश्ते जीवित नहीं रहेंगे तो खाक में जिंदगानी होगी।
भीम अग्रहरी

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