वो रात

                
                                                             
                            चोरों तरफ खूब मोमबत्ती से रोशन थी मैं
                                                                     
                            
उस दिन,ज़िंदगी ने मानो अचानक नई पहचान दे दी,
कुछ चीला रहे थे,कुछ रो रहे थे,कुछ मेरे लिये
रास्ते भी जाम कर रहे थे,
पर क्या मुझे इंसाफ में केवल यही चाहिए था,
मैं तो खत्म तो तब ही हो गई थी ,
जब हैवान हैं मुझे उसकी हैवानियत से छुआ था,
उसने खुद की हवस मिटा कर मुझे मिटाया था।
हां वो अंधेरी रात थी,
अनजान सड़क थी,
मेरी आवाज किसी को,
पुकार रही थी,
शायद मानो खुद को,
उस रात के लिए
कोस रही थी,
अजनबी था कोई
छू रहा था मुझको
खुद की नज़रों से,
शायद मेरी आँखें
कुछ तलाश रही थी,
करोड़ों की भीड़ मुझे
चुप चाप देख रही थी,
शर्मशार में हो रही थी,
हुआ बहुत कुछ,
महीनों-सालों बाद,
दीप- दान हो या मार्च,
आंदोलन हो या धरना,
पर मानो ये मोर्चे मुझे
कुछ हिदायत दे रहे थे,
उस दिन करोड़ों की भीड़
मैं तलाश रही थी और
आज नज़रों में थे मेरे
सब पर में न थी।।।।।
तो क्या
मेरे दुखों के किये
काफी थे ये मोर्चे??

- भावना पंवार


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 months ago
Comments
X